उसकी मिठास ही कुछ और थी

मुल्लाज जी, मुल्ला जी की बैरिंग बनाने की दो मशीनें और रघुवीर जी ये सभी, साथ साथ, उम्र के पड़ावों को पार करते हुये आज एकदूसरे के साथ चालीस साल गुजार चुके हैं। पहिये की तरह भागते पैर और चमकती आँखों में सफेदी छा गई है पर फिर भी रघुवीर जी अपने समय के पाबंद मुल्लाजी के कारखाने में आज भी समय से पहले पहुँचते हैं।

एक समय था जब इस कारखाने में लगभग आठ से दस लोग काम करते थे पर सभी धीरे धीरे छिटकते गये। लेकिन रघुवीर जी ना तो ये कारखाना भूले और ना ही ये तुर्कमान गेट की टेढ़ी मेढ़ी गलियाँ जो अंदर ही अंदर हमें कहाँ तक ले जायेगी ये कोई नही जान सकता।

मुझे याद है आज भी जब वो बताते थे की कैसे उनके पिताजी उनका हाथ पकड़कर इस कारखाने में उन्हें छोड़ गये थे ये कह कर की ये पढ़नेलिखने का नही है इसे इंसान बनाओ।और रघुवीर जी भी अपने पिताजी की जुबान के पक्के की इस कारखाने की गली ऐसी याद की कि आज तक भी इसी के फेर में पड़े हुये है।

अब कोई जोरजबरदस्ती नही है लेकिन लत लग गई है। इस जगह की, मुल्लाजी की, और इन चरमराती मशीनों की। और इधर मुल्लाजी का भी यही हाल है जब तक रघुवीर जी के साथ अपने सुख दुख की न बतला लें उन्हें चैन नही मिलता। हाथो में वो कसबल नही पर मशीने भी अब कहाँ जवान रह गई है!

मुल्लाजी के काम मे फायदा हुआ और उन्होनें खुश होकर रघुवीर जी को दो सौ रुपये नैग के रुप में दिये। रघुवीर जी का ये पहला मौका था जब दो सौ रुपये एक साथ उनके हाथ मे आये थे। बारह आने में वो इस कारखाने में लगे थे और अब साठ रुपये में उनकी गाड़ी आकर रूकी थी।

अपने घिसते कपड़े के जूते और पुराने पड़ते कुर्ते पजामे में लगे गिरिस के हाथ भी उनके चेहरे की रौनक छुपा नही पा रहे थे। वो एक अदा से घर में दाखिल हुये, हम सबकी नज़रें जैसे उनपर ही ठहर गईं। आज हुआ क्या था समझ नही आ रहा था। क्या खाओगे बताओ?”

ऐसा पहली बार नही हो रहा था। जब भी उनके पैसे दो या तीन दिन के इकटठे होकर मिलते थे वो ऐसे ही प्यार से पूछते थे।

सुमन जी ने मुस्कुराते हुये छत की तरफ देखा और बोली खिलाओगे तो बाद में पहले ये सोचो की इस पर तिरपाल कैसे डलेगी?”

रघुवीर जी जोश में बोले अरे छोड़! तिरपाल भी डल जायेगी। सावन पूरा सूखा उतर रहा है भादुआ लगने में अभी समय है।

माहौल जोशिला था। सभी अपनी पसंद की चीज़े बोल रहे थे। किसी को अण्डा खाना था, किसी को मक्खन, किसी को ब्रेड तो किसी को रस। और सबसे छोटी पारो को जलेबी।

रघुवीर जी ने झट से अपने कुर्ते की जेब से दस दस के नोट निकाले और उनमें से एक दस का नोट राहुल के हाथ में देते हुये बोले जा गरमागरम जलेबी ला।छोटी पारो तो जैसे जलेबी के रस में ही खो गई।

बाकियो से रघुवीर जी बड़े प्यार से बोले तुम सबके लिये ये सब सुबह मदर डेरी से जब दूध लेने जाऊंगा तो लेता आऊँगा।

रात के खाने के बाद 100 वाट के बल्ब की चुभती रोशनी में सभी नींद की खुमारी में जाने को तैय्यार थे। पर सुमन जी और रघुवीर जी की आंखो में नीन्द नही थी। वो चौखट के सीरे पर बैठे धीरे धीरे कुछ बतिया रहे थे। तभी रघुवीर जी ने सारे पैसे निकालकर सुमन जी की हथेली पर रख दिये।

सुमन जी पैसो को गिनते हुये बोली सुबह में बच्चो को खीर बनाकर बांटने का मन में आ रहा है।

रघुवीर जी सुमन जी की बात सुनकर खुश होते हुये बोले ये तो नेक ख्याल है। अब मन में आ गया है तो जरुर करना।

सुबह में सभी की ख्वाहिशों के साथ साथ शुरू हुई सुमन जी की खीर। पूरे कमरे में तलाश हुई मोटे और लम्बे चावलों की। सुमन जी ने वो चावल खास अपनी बेटियों के घर पर आने के लिये बचाकर रखे थे। जिनकी वे अपने हाथ से बिरयानी बनाती और उन्हे खिलाती।

कहां रखे हैंकभी पलंग के नीचे रखे गये डिब्बों मे उन्हे खोजा जाता तो कभी टीवी के पीछे बनी छोटी सी अलमारी में। मगर उनका मिलना हो नहीं रहा था। रघूवीर जी उन्हे देख रहे थे की आखिरकार हो क्या रहा है। पर कुछ बोलने की हिमाकत करना उनके लिये ठीक नहीं था। सुबह के 4 बजे हैं। बस्ती मे सभी सो रहे है लेकिन उनका घर में आज सुबह जल्दी हो गई है। सुमन जी ने सारे बड़े बर्तन खोज लिये हैं। थोड़ी गुस्सा भी हो रही है। लेकिन चलता है।

रघूवीर जी कह रहे हैं, “नहीं मिल रहे है तो रहने दे। कोई और चावल ले ले।

सुमन जी, “नहीं उसी के बनाऊंगी।

रघूवीर जी, “अरे मैं बाजार से ले आता हूँ।

सुमन जी, “नहीं, वो मोटा चावल है और पुराना है। जब तक मिलेगा नहीं तुम कहीं मत जाना। अच्छा जाओ तो जाकर दूध तो ले आओ।

रघुवीर जी दूध की थेली लेने के लिये निकल गये। और पूरी गली में बोलते हुए गये की बच्चों को स्कूल भेजने से पहले घर पर भेज देना।

सुमन जी अभी भी चावलों को ढूंढ रही थी। पलंग के नीचे घूस गई थी। फिर याद आया की वो तो एक पन्नी मे बांधकर दीवार पर टांगे हुए है। चावलों को उतारा गया। उन्हे साफ कर धोकर उन्हे रख दिया। पिछले रोज मिठाई का डिब्बा लाये तो बच्चों ने वो खाये मगर उनके ऊपर के बादाम और काजू को निकाल कर रख दिये थे। किसी खो पसंस नहीं आये थे वो। याद आया की उन्हे रख दिया था। वो भी निकाले गये। और खीर की ड्रिरेस पर उन्हे बटन की तरह रखा गया। फिर तैयार हुई एक जबरदस्त खीर।

पूरी बस्ती मे अब तक तो खीर की खूशबू से उसकी बात फैल गई थी। रघूवीर जी ने उसकी पब्लिसिटी जो कर दी थी। प्लासटिक के चाय वाले कप मंगाये गये और उसमे एक एक चमचा खीर डाली गई। उन्हे एक बड़ी सी थाल में सजाया गया और रघुवीर जी बस्ती में निकले उन बड़े से थाल को पकड़कर और गली में जो कोई भी बच्चा उन्हें दिखता वो उसके हाथ मे एक दोना पकड़ा देते।

खीर की मिठास, रघुवीर जी की मुस्कान और सुमन जी की तसल्ली जैसे आज बस्ती की हर गली में अपनी दस्तक दे रही थी।

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समय के पास सीधे जाना मुश्किल है

एंकात के धब्बों में कुछ धुंधला सा बनता हुआ।
धीरे धीरे आगे बढ़ता हुआ, अपने पीछे कुछ छोड़ता तो कुछ मिटाता। समय सभी के साथ अपना सफ़र जारी रखता है। चंद घड़ियों के चिथड़ों में लिटता सा एक अहसास।

वो चोर

भूरी भाभी उठ कर कुछ देर बिस्तर के सिरे पर बैठी रहीं। क्या उन्होंने सपना देखा था? हरगिज़ नहीं! उन्होंने अपना शरीर बिस्तर के कोने की तरफ़ घुमाया। वो यहीं खड़ा था। मैं सो रही थी, कि करवट लेते हुए मेरा पैर उस से टकराया और मेरी नींद खुल गई। उन्होंने अपने बिखरे बाल इकठ्ठा कर के कस कर एक जूड़े में बाँधे। उस में से बालों की एक पतली डोरी निकल कर उन के कंघे पर साँप की तरह लिपट गई। उस की ये मजाल! कैसा चौड़ा हुआ खड़ा था, जैसे कि कोई डर ही नहीं। और इस के साथ रात का वाक्या भूरी भाभी के दिमाग में ऐसे लौटा जैसे किसी फ़िल्म के सीन दौहरा रहीं हों।

उन की नींद टूटी थी और उन्होंने किसी को अपने पैरों के पास, बिस्तर के बगल में देखा। कुछ मिनट तक उसे देखते रहने के बाद, वैसे ही लेटे लेटे उन्होंने पूछा, “कौन हो? कहाँ से आए हो?”
उस ने जवाब दिया, “यहीं पड़ोस में ही रहता हूँ।”
भूरी भाभी का डर एकदम ग़ुस्से में बदला और बिस्तर से फ़टाक उठती हुई वो बोलीं, “रुक! अभी बताती हूँ तुझे! समझ क्या रखा है! इतना पीटूँगी कि पानी भी नहीं माँग सकेगा!”
ये कह कर वो उठीं और अपनी चप्पल उठा कर उस की तरफ़ मुड़ीं, पर वो दरवाज़े से भागता हुआ निकल चुका था।

कितना मुश्किल था इस के बाद भूरी भाभी के लिये सोना। वो सोचती रहीं कि काश नईम साहब घर पर होते, तो उसे सबक सिखा देते। पर शायद नईम साहब के होते वो नामाकूल इस तरह घर में घुसने की ग़ुस्ताखी करता ही नहीं। “आने दो नईम साहब को,” उन्होंने अपने दाँत पीसते हुए सोचा। “वो करेंगे इस के बारे में कुछ।”

रात के बारे में और सोचने का उन के पास अब समय नहीं था। बाहर बरमे पर औरतों की आवाज़ें आने लगीं थीं। वो झट उठीं और पानी भरने के लिये बर्तन उठाए। साथ साथ दिन भर के काम को मन में दोहराया। आज नईम साहब दो दिन के काम के बाद थके हुए लौटेंगे। घर साफ़ करना है, शाम के लिये कुछ बढ़िया पकाना है। यही सोचते-सोचते वो बरमे पर पहुँचीं, और डब्बों से बनी लाइन के अंत में अपने डब्बे रख कर अपना नम्बर लगा कर बरमे पर खड़ी बाकी औरतों के पास जा खड़ी हो गईं।

“पता है कल मेरे साथ क्या हुआ!” उन्होंने अपनी बात शुरु की। सब औरतों ने मुड़ कर भूरी भाभी की तरफ़ देखा। किसी क़िस्से की महक उन के नाक पर चढ़ गई। “तुम तो जानती ही हो मैं कितनी गहरी नींद में सोती हूँ,” भूरी भाभी ने अपनी बात आगे बढ़ाई। “अच्छा, मैं बहुत गहरा सोती हूँ, पर आजकल नईम साहब हैं नहीं न, तो मैं कच्ची नींद सोती हूँ, कि कुछ हो तो आँख एकदम खुल जाए। कल आधी रात हुआ यूँ कि मेरा पैर सोते में किसी चीज़ से टकराया। नींद झटपट टूटी तो देखती हूँ कि कोई नौजवान सा बिस्तर के कोने पर मेरे पैरों के बगल में खड़ा है। मैं तो भई ज्यों कि त्यों लेटी रही, और कुछ देर उसे घूरा। अंधेरा बहुत था, तो शक़्ल तो नज़र नहीं आ रही थी, पर शरीर से लग रहा था कोई 25-28 साल का होगा। फिर मैं ने ज़ोर से उस से पूछा, “कौन है तू? कहाँ से आया है?” वो बोला, “यहीं पड़ोस में रहता हूँ।” बस फिर क्या था! मैं यूँ उठी और उस चोर को सबक सिखाने की सोच के अपनी चप्पल उठा कर मुड़ी पर वो दरवाज़े से फ़रार हो चुका था। देखती हो, क्या ज़माना आ गया है। मियाँ क्या बाहर गए कि चोर-उचक्के घर में घुस आए। बहन, मजाल तो देखो इनकी!”

भूरी भाभी ने एक साँस में अपनी पूरी बात कह डाली। अब अपना सर हिलाते हुए ज़मीन को देख रहीं थीं। कुछ रुक के बोलीं, “सलमा, पानी बहा जा रहा है, चल अपना बर्तन हटा, मुझे भी भरना है।” ये कह कर वो लगीं अपने बर्तन उठाने। पीछे से उन्हें कुछ हँसने की आवाज़ आई।
“सुनो तो। कहती है चोर घुस आया।”
“हम जानते नहीं क्या भूरी!”
“मियाँ गए नहीं, कि बस…”
“क्यों कहाँ मिलीं थीं उसे, बोलो।”
“क्यों भई, वहीं बाज़ार में हुआ होगा।”
“जाती भी तो कितना है, कि वहीं से ख़रीदूँगी सब्ज़ी।”
यूँ ही कहते-कहते औरतें ज़ोर से हँसती हुई अपने अपने रास्ते हो लीं। भूरी भाभी वहीं खड़े सोचती रहीं कि सब कह क्या गईं, वो तो चोर की बात बता रहीं थीं। पानी उन के बर्तन से निकल कर आसपास बहे जा रहा था।

बात पूरी बस्ती में फैली। और घूम-घूम कर अलग अलग आवाज़ों में भूरी भाभी तक लौटी। वो जहाँ भी जातीं, ये बात काना-फूसी बन के उन का पीछा करती। वो कुछ भी कर रही होतीं, तो चुपके से वो आकर उन्हें डस जाती। अपने ख़्यालों में चल रहीं होतीं, तो यकायक आसपास गूँज उठती। वो उस से भागतीं, और वो उन के पीछे पीछे दौड़ती। वो भागते भागते थक गईं और अपने घर की पनाह में उस से छिप कर शाम के लिये खिचड़ी बनाने लगीं – कुछ तो अपना ध्यान कहीं और घुमाने के लिये, और कुछ इसलिये कि अगर वो कुछ नहीं बनाएंगीं तो शाम को दोनों मियाँ-बीवी को भूखा रहना पड़ेगा। कुकर को धो कर, चावल और दाल बीन कर उन्होंने खिचड़ी हल्की आँच पर चढ़ा दी। नईम साहब थके हुए आएँगे, उन्होंने सोचा, तो कम से कम खाने के लिये उनके लिये गर्म गर्म खिचड़ी तो होगी। अरे! नईमा साहब की तो सोची ही नहीं तूने भूरी! वो ये सब बातें सुनेंगे तो क्या सोचेंगे?

भूरी भाभी का दिमाग़ ये सोच के भारी हो गया और वो वहीं आँच की बगल में लेट कर सो गईं।

जब उन की आँख खुली तो कुकर की सीटी बज रही थी। उन्होंने कुछ देर कुकर को घूरा। कुकर को देखते-देखते एकदम कुछ हुआ। दिन भर की सारी आवाज़ें उन के ज़हन में रीवाइंड हुईं। उस लम्हे दिन भर के “औ-हो”, “उफ़्फ़”, “ह्म्म”, “विशवास नहीं होता”, “क्या तुम ने सुना है”, “पता है क्या हुआ”, “तुम्हें नहीं पता भूरी ने क्या किया”; वो सब निगाहें जो उन्हें गली में से गुज़रते, दुकानों से लौटते, पानी भरते, सब्ज़ी ख़रीदते उन पर हँसी थीं; वो सब नज़रें जो घर की दीवारों के छेदते हुए उन को आरी की तरह काट गईं थीं; बुज़ुर्गों का वो सिर हिला कर उन्हें कुछ ग़लत करने का अहसास दिलाना, जवानों का उन्हें देख कर खिलखिला के हँस देना, उन की हमउम्र औरतों का अपनी चौखटों पर खड़े हो कर उन पर ताने कसना; वो उन का ध्यान अपनी तरफ़ खींचते सब के इशारे, वो उन को दुहाई देते सभी के लब, वो सब अंगुलियाँ जो उन को गुनहगार ठहराने उन की तरफ़ उठीं – ये सब भाप की तरह उठ कर कुकर पर एक परत बन कर चिपक गईं। कुकर के कवर पर जो भूरा धब्बा था, वो पहले तो नहीं देखा था। कवर का ठुका हुआ किनारा नया था। कुकर का गोलाकार चपटा हो गया था। सतह कितनी खुर्दुरी थी, चमक गायब थी। हैंडल बीच से पिघला क्यों हुआ था? सीटी की आवाज़ इतनी तेज़ क्यों थी? कुकर इस तरह थर्र-थर्र काँप क्यों रहा था?

भूरी भाभी खड़ी हुईं और पास में रखी कढ़ची उठा कर ज़ोर से कुकर पर फेंकी। सामने के घर में बैठी लक्षमी ने आवाज़ सुनी तो झट उठ कर भाभी के दरवाज़े पर आ खड़ी हो गई। अब तक भाभी के हाथ में एक हथौड़ा था। उन्होंने कुकर को आँच पर से उठा कर कमरे के बीच में रखा और हथौड़े से उस पर कस के मारा।
“क्या हुआ भाभी?” लक्षमी ने घबराई हुई आवाज़ में पूछा।
“देख तो लक्षमी, चोर कुकर बदल गया।”
इतना कह कर भूरी भाभी हथौड़े से कुकर को पीटने लगीं।

370 दिनों के बाद पहली मुलाकात

जैसे जैसे समय बढ़ता जाता है वैसे वैसे ही सबकुछ साथ छोड़ने लगता है, इसलिए शायद समय के रहते ही चीज़ें करली जाये तो वो टूटती नहीं।

मेरा पैन एक साल के बाद इसका जायजा लिया तो ये भी दम तोड़ने लगा पर पैन का क्या? ये तो और लाया जा सकता हैं। बस, दिमाग की सुरंग में कचरा नहीं अटकना चाहिये। पैन, कभी नहीं सूखता – इसके अन्दर जैसे अभी और अनगिनत शब्द छुपे हैं। वे जो उन शब्दों को निखारता है और दुनिया में लाता है। पर फिर भी वे उसके नहीं होते। उससे अपने रंग पाते हैं। फिर अपने आप की जुबान बोलते हैं। जैसे किसी गर्भवती माहिला के भीतर उसका बच्चा। जब तक दुनिया में नहीं आता माहिला की नाक से सांस भरता है। मगर जैसे ही दुनिया में उतर आता है तो अपनी सांस दुनिया से छीन लेता है।

मेरा पैन कभी नहीं सूखा, ये झूठ है। वे बोलता नहीं था। वे टोकता नहीं था। वे शब्दों से नराज हो गया था। तरल था लेकिन ठोस होने की अदाकारी निभा रहा था या तो वे शब्दों से दुखी हो गया था या उसे कुछ नया चाहिये था।

मैं जब भी कुछ करने बैठती हूँ तो मेरे शरीर से जन्मा शरीर मुझे पुकारता है। कभी तो लगता है कि इसे तड़पने दूं फिर लगता है नहीं, यह तड़पने के लिये दुनिया में नहीं आया हैं। मुझे कभी कभी लगता था कि मैंने सब कुछ खो दिया फिर दूसरे ही पल में लगता कि नहीं, बहुत कुछ पा लिया। मैं लिख रही हूँ और वो बहुत प्यार से मुझे देख रहा है। उसकी आंखे मुझसे सवाल कर रही हैं जिनमे मुझे अपने लिये चाहत और चैलेंज दिखता है। ऐसी चाहत जो मुझे नहीं चाहती बस मुझसे कुछ चाहती है। मुझे लगता है कि वो मुझे समझने के लिये मुझे देख रहा है और मैं उसकी नज़र से तब नज़र मिला पाती हूँ जब मैं अपने “मैं” से बाहर होती हूँ। उसकी प्यारी प्यारी अदायें बार बार मेरा ध्यान अपनी ओर खींच लेती हैं। ये ज़िंदगी जो मैं जी रही हूँ ये बहुत अनोखी है और ये मेरी नहीं है ये उस शरीर की दी हुई है। जो मुझे “मैं” नहीं रहने देता।

अपनी हताश ज़िंदगी को लोग किसी चीख के हवाले कर देते हैं। चीख, पुकार, झल्लाना जिसमे वो अपने बदलते रूप की बनती परछाई को सिसकने के लिये अकेला छोड़ देते हैं। हमसे जब कोई अपनी चीज छूटती है तो हम चीखते हैं, झल्लाते हैं, अपने दायरे बनाते हैं, लोगों से कटते हैं। जबकि जो हमें ज़िंदगी मिली है वो कुछ समय के लिये ही मिली है। वो शायद पूरी उमंग के साथ जीने की कल्पना देती है। वो हमारे अन्दर से कुछ कम या खाली करने के लिये दाखिल नहीं होती। बल्कि हमारी ज़िंदगी में एक नया पहलू, एक नहीं उड़ान, एक नई चाहत, एक नया उल्लास, एक नया रंग लेकर आती है।

जब हम इसके साथ बहने लगते है तब हमें अपने निजी को जीने के नये आयाम मिलते हैं जो “मेरा”, “हमारा” और “अपना” के बंधन से मुक्त होता है।

कभी न भरने वाला अहसास

कहते हैं ज़्यादा चीनी भी मुँह का ज़ायका बिगाड़ देती है। ऐसा ही शायद दो लोगों के बीच का रिश्ता होता है जिसमें बेहद नज़दीकी भी एक ऐसे कसैलेपन को जन्म देती है जो भले ही दिखे न पर रिश्ते की नींव के साथसाथ वो भी पनपने लगता है। तभी शायद रिश्ते में गैप होना जरूरी होता है ताकि रिश्ते की ताज़गी और मिलने की उत्तेजना उतनी ही सुहानी लगे जितनी की किसी अजनबी से मिलने पर होती है।

हर बार अजनबी होकर मिलना रिश्ते के ऊपजाउपन को बनाये रखता है और हर बार एक नये सवाल, रूप और आदत से उसका परिचय कराता है।

समाजिक ज़िन्दगी में गैप की क्या अहमियत है? लोग गैप को जीते कैसे है?

हमारी सामने वाली सीट पर कौन आकर बैठेगा ये हम नही जानते। लेकिन किसी न किसी को उस पर आकर बैठना है। एक सीट पर दो साथी दोनो ही एकदूसरे की राह से अंजान पर फिर भी साथ सफ़र करते हैं हर दिन, ये दिन जीवन की उस पूँजी का हिस्सा बनते है जहाँ खुद को बनावटीपन के अभिनय से लोग मुक्त करके अपने रास्ते के इन्तज़ार में गैप की महीन रेखाओं के बीच बस आगे ही बढ़ते चलते हैं।

गैप फिर भी बचा रह जाता है जो कभी ना भरने के लिये ज़िन्दा रहता है क्योंकि अगर आपने इस गेप को भर दिया तो समझों किसी अंदेखे जीवन का अंत कर दिया। कुछ गेप अगर जीवन भर रहे तो जीने के तरल मज़ा और जीवन का सार बचा रहता है। ये इस गेप की सांसे नहीं बल्कि किसी ताज़े और बासी शरीरों के बीच पल रहे रिश्ते की धड़कने हैं।

अगर आप लिखते हैं तो ये गेप आपके सोचने और कल्पना करने मे सबसे ज्यादा साहयक होता है। इसी बीच के अहसास मे आप खेल पाते हो नहीं बस, हकीकी और अतीत के चक्कर मे कुछ ऐसे फँस जाओगे की खुद को कभी शब्दों के हवाले नहीं कर पाओगे।

ये मैं अपने उस अनुभव से कह पा रही हूँ जो कई बार रूका और कभी बार जगा है। गेप को भरने की चाहत मे खुद को तोड़ा है और बनाया है।

एक ऐसी सुबह, जो हो सबकी सुबह :

एक सुबह ऐसी भी हो जब सभी अपनीअपनी आदतो को छोड़ कुछ ऐसा करे जिसमें वो किसी चीज़ के आदि ना नज़र आये। जैसे कोई चाय का आदि, कोई वाक का आदि, कोई कसरत का आदि, कोई नहाने का आदि, कोई पखाने का आदि, कोई घूमने का आदि। इस आदि से दूर एक सुबह की तलाश।

क्या हम जानते है की हमारी रात कौनसी सुबह की उम्मीद में सोती है? जिसमें ख़्वाब मनगढ़ंत और बहकी हुई कहानियों से बुने होते हैं मगर फिर भी रात नींद की आगोश में बेफिकर सो जाती है। कोई सुबह की तलाश क्यों करें? एक ऐसी सुबह की जो काल्पनिक है।

कोई सुबह में भागना चाहता है।

कोई बैठना चाहता है।

कोई गुनगुना चाहता है।

कोई खिलखिलाना चाहता है।

कोई बस में खिड़की की सीट पाना चाहता है।

कोई दरवाज़े पर घण्टो खड़े होकर बाहर का नज़ारा देखना चाहता है।

कोई अजनबियों से हाथ मिलाना चाहता है।

कोई भीड़ से दूर निकल जाना चाहता है।

कोई बस मन से बढ़ते कदमों के साथ कहीं निकल जाना चाहता है।

कोई अपनो से अपनेपन से बहुत दूर कुछ बनाना चाहता है।

कोई मोह माया की बनी बस्तियों से दूर अपना कुछ करना चाहता है।

काल्पनिक सुबह के आगोश में पल रही ऐसी चाहतें जो गहरी नींद में सोई हुई हैं।

खुद से पूछा है कभी :

  • आज की योजना (प्लान) क्या है?
  • कोन है जिससे मिलना है?
  • कोन है जिसको बुलाना चाहते हैं?
  • आज कोनसी जगह जाऊँ?
  • आज पहनूँ क्या?
  • कोनसी किताब निकालूँ पढ़ने के लिये?
  • मार्किट से क्या लाऊँ?
  • टीवी मे क्या देखूँ?
  • किसी से क्या बात करूँ?
  • घर को कहाँ तक साफ करूँ?

खुद से पूछा है कभी

  • मन को कैसे बहलाऊँ?
  • बोरियत कैसे मिटाऊँ?
  • वक़्त कैसे गुज़ारूँ?
  • आज तैयार कैसे होऊँ? आज क्यों तैयार होऊँ?
  • फोन पर किसी से बात करूँ?
  • आज लिखूँ क्या? खुद के बारे मे लिखूँ या खुद से बाहर का लिखूँ?
  • पिछले दिन को क्यों दोहराऊँ?
  • नई डायरी क्यों न बनाऊँ?

खुद से पूछा है कभी

  • खुद को व्यक़्त करने के लिये गाना कोनसा गाऊँ?
  • खुद को दोबारा देखने के लिये नई एलबम क्या बनाऊँ?
  • आज कोई ऐसा मिले जो रिश्तों से बाहर हो?
  • किसी से पहला करूँ सवाल करूँ?
  • बराबर वाली सीट पर क्यों किसी को जगह दूँ?
  • देखे हुए रास्तों को फिर क्यों देखती हुई जाऊँ?
  • छत पर क्यों जाऊँ, वहाँ करूँ क्या? पड़ोस की छत से क्या बात करूँ?
  • आज बस बालकनी मे खड़े होकर गली को ही क्यों न देखूँ?
  • आज छुट्टी क्यों न करूँ सारे कामों और रिश्तों से?
  • कोई नया बहाना क्यों न सोचूँ?

खुद से पूछा है कभी

  • आज सबके के लिये कान क्यों न बंद करूँ?
  • आज कदमों को बंजारा क्यों न बनाऊँ?
  • क्यों न मैं भी अपने ऊपर आवारा होने का टेग लगवाऊँ?

खुद से पूछा है कभी

ये सारे क्यों, क्या और कैसे इंसान को कमज़ोर नहीं बनाते बल्कि उसे दूर कहीं पहुँचा देते हैं जिसकी उम्मीद और चाहत उसे कभी बिना खुद से सवाल लिये मिल नहीं सकती।