उसकी मिठास ही कुछ और थी

मुल्लाज जी, मुल्ला जी की बैरिंग बनाने की दो मशीनें और रघुवीर जी ये सभी, साथ साथ, उम्र के पड़ावों को पार करते हुये आज एकदूसरे के साथ चालीस साल गुजार चुके हैं। पहिये की तरह भागते पैर और चमकती आँखों में सफेदी छा गई है पर फिर भी रघुवीर जी अपने समय के पाबंद मुल्लाजी के कारखाने में आज भी समय से पहले पहुँचते हैं।

एक समय था जब इस कारखाने में लगभग आठ से दस लोग काम करते थे पर सभी धीरे धीरे छिटकते गये। लेकिन रघुवीर जी ना तो ये कारखाना भूले और ना ही ये तुर्कमान गेट की टेढ़ी मेढ़ी गलियाँ जो अंदर ही अंदर हमें कहाँ तक ले जायेगी ये कोई नही जान सकता।

मुझे याद है आज भी जब वो बताते थे की कैसे उनके पिताजी उनका हाथ पकड़कर इस कारखाने में उन्हें छोड़ गये थे ये कह कर की ये पढ़नेलिखने का नही है इसे इंसान बनाओ।और रघुवीर जी भी अपने पिताजी की जुबान के पक्के की इस कारखाने की गली ऐसी याद की कि आज तक भी इसी के फेर में पड़े हुये है।

अब कोई जोरजबरदस्ती नही है लेकिन लत लग गई है। इस जगह की, मुल्लाजी की, और इन चरमराती मशीनों की। और इधर मुल्लाजी का भी यही हाल है जब तक रघुवीर जी के साथ अपने सुख दुख की न बतला लें उन्हें चैन नही मिलता। हाथो में वो कसबल नही पर मशीने भी अब कहाँ जवान रह गई है!

मुल्लाजी के काम मे फायदा हुआ और उन्होनें खुश होकर रघुवीर जी को दो सौ रुपये नैग के रुप में दिये। रघुवीर जी का ये पहला मौका था जब दो सौ रुपये एक साथ उनके हाथ मे आये थे। बारह आने में वो इस कारखाने में लगे थे और अब साठ रुपये में उनकी गाड़ी आकर रूकी थी।

अपने घिसते कपड़े के जूते और पुराने पड़ते कुर्ते पजामे में लगे गिरिस के हाथ भी उनके चेहरे की रौनक छुपा नही पा रहे थे। वो एक अदा से घर में दाखिल हुये, हम सबकी नज़रें जैसे उनपर ही ठहर गईं। आज हुआ क्या था समझ नही आ रहा था। क्या खाओगे बताओ?”

ऐसा पहली बार नही हो रहा था। जब भी उनके पैसे दो या तीन दिन के इकटठे होकर मिलते थे वो ऐसे ही प्यार से पूछते थे।

सुमन जी ने मुस्कुराते हुये छत की तरफ देखा और बोली खिलाओगे तो बाद में पहले ये सोचो की इस पर तिरपाल कैसे डलेगी?”

रघुवीर जी जोश में बोले अरे छोड़! तिरपाल भी डल जायेगी। सावन पूरा सूखा उतर रहा है भादुआ लगने में अभी समय है।

माहौल जोशिला था। सभी अपनी पसंद की चीज़े बोल रहे थे। किसी को अण्डा खाना था, किसी को मक्खन, किसी को ब्रेड तो किसी को रस। और सबसे छोटी पारो को जलेबी।

रघुवीर जी ने झट से अपने कुर्ते की जेब से दस दस के नोट निकाले और उनमें से एक दस का नोट राहुल के हाथ में देते हुये बोले जा गरमागरम जलेबी ला।छोटी पारो तो जैसे जलेबी के रस में ही खो गई।

बाकियो से रघुवीर जी बड़े प्यार से बोले तुम सबके लिये ये सब सुबह मदर डेरी से जब दूध लेने जाऊंगा तो लेता आऊँगा।

रात के खाने के बाद 100 वाट के बल्ब की चुभती रोशनी में सभी नींद की खुमारी में जाने को तैय्यार थे। पर सुमन जी और रघुवीर जी की आंखो में नीन्द नही थी। वो चौखट के सीरे पर बैठे धीरे धीरे कुछ बतिया रहे थे। तभी रघुवीर जी ने सारे पैसे निकालकर सुमन जी की हथेली पर रख दिये।

सुमन जी पैसो को गिनते हुये बोली सुबह में बच्चो को खीर बनाकर बांटने का मन में आ रहा है।

रघुवीर जी सुमन जी की बात सुनकर खुश होते हुये बोले ये तो नेक ख्याल है। अब मन में आ गया है तो जरुर करना।

सुबह में सभी की ख्वाहिशों के साथ साथ शुरू हुई सुमन जी की खीर। पूरे कमरे में तलाश हुई मोटे और लम्बे चावलों की। सुमन जी ने वो चावल खास अपनी बेटियों के घर पर आने के लिये बचाकर रखे थे। जिनकी वे अपने हाथ से बिरयानी बनाती और उन्हे खिलाती।

कहां रखे हैंकभी पलंग के नीचे रखे गये डिब्बों मे उन्हे खोजा जाता तो कभी टीवी के पीछे बनी छोटी सी अलमारी में। मगर उनका मिलना हो नहीं रहा था। रघूवीर जी उन्हे देख रहे थे की आखिरकार हो क्या रहा है। पर कुछ बोलने की हिमाकत करना उनके लिये ठीक नहीं था। सुबह के 4 बजे हैं। बस्ती मे सभी सो रहे है लेकिन उनका घर में आज सुबह जल्दी हो गई है। सुमन जी ने सारे बड़े बर्तन खोज लिये हैं। थोड़ी गुस्सा भी हो रही है। लेकिन चलता है।

रघूवीर जी कह रहे हैं, “नहीं मिल रहे है तो रहने दे। कोई और चावल ले ले।

सुमन जी, “नहीं उसी के बनाऊंगी।

रघूवीर जी, “अरे मैं बाजार से ले आता हूँ।

सुमन जी, “नहीं, वो मोटा चावल है और पुराना है। जब तक मिलेगा नहीं तुम कहीं मत जाना। अच्छा जाओ तो जाकर दूध तो ले आओ।

रघुवीर जी दूध की थेली लेने के लिये निकल गये। और पूरी गली में बोलते हुए गये की बच्चों को स्कूल भेजने से पहले घर पर भेज देना।

सुमन जी अभी भी चावलों को ढूंढ रही थी। पलंग के नीचे घूस गई थी। फिर याद आया की वो तो एक पन्नी मे बांधकर दीवार पर टांगे हुए है। चावलों को उतारा गया। उन्हे साफ कर धोकर उन्हे रख दिया। पिछले रोज मिठाई का डिब्बा लाये तो बच्चों ने वो खाये मगर उनके ऊपर के बादाम और काजू को निकाल कर रख दिये थे। किसी खो पसंस नहीं आये थे वो। याद आया की उन्हे रख दिया था। वो भी निकाले गये। और खीर की ड्रिरेस पर उन्हे बटन की तरह रखा गया। फिर तैयार हुई एक जबरदस्त खीर।

पूरी बस्ती मे अब तक तो खीर की खूशबू से उसकी बात फैल गई थी। रघूवीर जी ने उसकी पब्लिसिटी जो कर दी थी। प्लासटिक के चाय वाले कप मंगाये गये और उसमे एक एक चमचा खीर डाली गई। उन्हे एक बड़ी सी थाल में सजाया गया और रघुवीर जी बस्ती में निकले उन बड़े से थाल को पकड़कर और गली में जो कोई भी बच्चा उन्हें दिखता वो उसके हाथ मे एक दोना पकड़ा देते।

खीर की मिठास, रघुवीर जी की मुस्कान और सुमन जी की तसल्ली जैसे आज बस्ती की हर गली में अपनी दस्तक दे रही थी।

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